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- Apoorva Mudgal
- Jul 5
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Updated: Jul 9
माँओं ने नहीं गिनाया कभी
कितने परांठे सेंके गए
कितनी दालें छौंकी गईं
कितनी चोटियाँ गूंथी गईं
माँओं ने नहीं गिनाया
कितने मेहमान पेट-भर खिलाए गए
कितने जोड़ी हाथ-पाँव दबाए गए
बच्चों के स्कूलों के कितने चक्कर लगाए गए
कितने क़दम सब्ज़ी ठेलों के पीछे दौड़ाए गए
“बचा कल ले लेना भैया, अभी इन्होंने महीने के पैसे नहीं दिए हैं”
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी में बिना पंखों के
गलती सर्दी में बिना गर्म पानी
कितने बर्तन माझे गए
कितने कपड़े धोये गए
कितनी रोटियाँ बेली गईं
कितने टिफ़िन लगाए गए
नहीं गिनाया
बारिश बाद के कितने झोंके
मायके के कितने तीज-त्योहार
अपने हिस्से के कितने पैसे
पूजा के आले के कितने बताशे
अपने मोहल्ले की कितनी दिवाली
प्रत्येक दिवाली के कितने पटाखे
अपनी सहेलियों के कितने ठहाके
अपने तोते की कितनी बोलियां
अपने नाम के कितने ख़त
अपनी जवानी के कितने स्कैंडल
भुलाए गए, गंवाए गए
नहीं गिनाया
कितनी उम्मीदें तोड़ी गईं
कितने स्वप्न दिखाए गए
कितने वचन निभाए गए
‘बेटी समान बहू’
बीमार पड़ीं तो बुलवा भेजी गयीं नौकरानियाँ
‘घर की मालकिन’, 'गृहस्वामिनी'
उठाती रहीं झूठे बर्तन
‘प्राणप्रिया’, 'कुल लक्ष्मी', 'देवी'
वर्षों धोती रहीं टॉयलेट कमोड
लगाती रहीं हमारे क़दमों में पोंछा
खाती रहीं हमारे हिस्से की डाँट
नहीं गिनाया
इनमें से कुछ भी नहीं गिनाया
कभी नहीं गिनाया
वरना मुझे याद होता
जैसे कि याद है पापा ने
कितने घंटे काम किया
कितना कम आराम किया
किस बैंक से कितना लोन लिया
किस बॉस ने वेतन काट लिया
कितने अवसर छोड़ गंवाए
कितने संकट दूर भगाए
कहाँ घूमने नहीं गए हैं
कितनी बार बीमार पड़े हैं
कितने कमज़ोर हो गए है
कितने उदास रहने लगे हैं
मुझे याद होता



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